आधा-आधा क्यों?

अग्नि में सोम की आहुति को हम यज्ञ कहते हैं। पुरुष (अग्नि) शरीर में सौम्या स्त्री आहूत होकर पति के साथ रहकर अर्द्धांगिनी कहलाने लगती है। जो आहूत होता है-सोम कहलाता है। सोम ही अन्न है। अन्न ही शरीर बनता है। पुन: अन्न से मन, मन से कामना, कामना से कर्म का उदय होता है।
आधा-आधा क्यों?
 
 

हमारे ऋषियों ने सृष्टि के कुछ मूल सिद्धान्त इस प्रकार प्रतिपादित किए हैं कि वे केवल भीतर जाकर ही समझे-समझाए जा सकते हैं। यहीं गुरु की भूमिका समझ में आती है। ऐसा ही एक सिद्धान्त है-अर्द्धनारीश्वर का। जगत अग्नि-सोम का मिश्रण है-यह एक दृष्टि है। अग्नि ही सोम है, सोम ही अग्नि है, दोनों एक ही हैं। केवल स्वरूप परिवर्तन मात्र है। स्वरूप ही शरीर है, भीतर दोनों एक ही हैं। भीतर आत्मा पुरुष है, बाहर शरीर माया है। यह अर्द्धनारीश्वर है। प्रत्येक व्यक्ति आधा पुरुष, आधा नारी होता है। शास्त्र कह रहे हैं कि सृष्टि में केवल ब्रह्म ही है, अन्य कुछ नहीं। तब यह नारी कौन है, पुरुष से भिन्न कैसे है? कृष्ण भक्त मानते हैं-‘राधे! तेरे बिना कृष्ण आधे!’

अग्नि में सोम की आहुति को हम यज्ञ कहते हैं। पुरुष (अग्नि) शरीर में सौम्या स्त्री आहूत होकर पति के साथ रहकर अर्द्धांगिनी कहलाने लगती है। जो आहूत होता है-सोम कहलाता है। सोम ही अन्न है। अन्न ही शरीर बनता है। पुन: अन्न से मन, मन से कामना, कामना से कर्म का उदय होता है। अत: ये कर्म सबके अलग-अलग हो जाते हैं क्योंकि व्यक्ति भी त्रिगुणात्मक है और अन्न भी। मन सोम है, ऋत है, चंचल है। इन्द्रियों के द्वारा विषयों से जुड़कर चंचल बना रहता है। कामना ही इसको चंचल रखती है। कामना मन का बीज है। इसी चित्तवृत्ति के निरोध को योगी अभ्यास से साधने का प्रयास करते हैं।

पुरुष शरीर में अन्न ही शुक्र (रेत) बनता है- सोम होने से अग्नि में आहूत होता है। यही सोम पौरुष रूप में अभिव्यक्त होता है। यही पुरुष का सौम्य (स्त्री) भाव है। इसी तरह अन्न ही स्त्री शरीर में आर्तव-शोणित-रक्त बनता है- अग्नि प्रधान है, पुरुष भाव है। इसी में रेत आहूत होता है। भीतर सोम होने से पुरुष आसानी से सफल नहीं होता। शरीर सुख की कामना से स्त्री चंचल-मन रहती है। इसीलिए ईश्वर ने दोनों को एक-दूसरे का पूरक बनाया है, ताकि दोनों मुक्त हो सकें।

आत्मा मन-प्राण-वाक् है, सत्व-रज-तम है, ब्रह्म-क्षत्र्-विड् है। तीनों साथ रहते हैं। इन्हीं को अव्यय-अक्षर-क्षर कहा जाता है। इनमें अव्यय को पुरुष तथा अक्षर और क्षर को प्रकृति कहते हैं पुरुष की। पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, आत्मा ये आठ प्रकार की क्षर (अपरा) प्रकृति हैं और जगत् को धारण करने वाली अक्षर (परा) चेतन प्रकृति है। शक्ति रूपा है। प्रकृति पुरुष की ही है, पुरुष से ही पैदा होती है किन्तु दिखाई भिन्न देती है। पुरुष प्राण रूप से रेत में प्रवाहित रहता है। उसी रेत में प्रकृति प्रवाहित रहती है। एक से ईश्वर प्रजापति और दूसरे से जीव प्रजापति पैदा होते हैं। दोनों ही द्वा-सुपर्णा रूप आत्मा के अंग होते हैं। जीवात्मा ही स्थूल रूप में नर-नारी बनते हैं।

प्रकृति में यह विभाजन कैसे होता है? पुरुष शुक्र (बीज) केवल पुरुष शरीर में ही पहुंचता है। सन्तान उत्पन्न करता है। स्त्री शरीर में पहुंचने से इसे कैसे रोका जाता है? इसी कारण तो प्रकृति पुरुष नहीं बन पाती। पुरुष शुक्र में नर-नारी का विभाजन होता है, अथवा स्त्री शरीर में! यह कोई साधारण विभाजन नहीं है। कर्मों का, फलों का, भाग्य का, ऋणानुबन्ध का विभाजन है। पुरुष का भाग्य पितृ-गृह से तथा स्त्री का भाग्य पति-गृह से सूत्रात्मक रूप से जुड़ा रहता है। इसीलिए स्त्री शरीर में पिता का बीज नहीं जाता।

सृष्टि के तीन विभाग हैं-आत्मा, प्रकृति और विकृति। इन तीनों सृष्टियों का आधार सोम तत्त्व ही है। सोम लोक अर्थात् महान में ही षोडशी आत्मा गर्भ धारण करता है (मम योनिर्महद् ब्रह्म)। ब्रह्म में अप् तत्त्व की आहुति से विश्व का निर्माण हुआ है। प्रकृति में प्रकृति द्वारा सृष्टि करने का कार्य भी सोम सम्बन्ध पर ही निर्भर है। यही सोम अव्यक्त स्वयंभू का जनक है। भूपिण्ड का जनक है। इसी सोम का अंश चन्द्रमा है। चान्द्ररस का नाम श्रद्धा है-‘आपो वै श्रद्धा सनमन्ते’ ‘श्रद्धा वा मेध्यावा आप:’ कहा जाता है। यही श्रद्धा चान्द्ररस दिव्याग्नि में आहूत होकर सोमरूप बन जाता है। श्रद्धा पहली अवस्था है, सोम दूसरी। इसी की पांचवी आहुति पुरुष रूप में परिणत होती है। ऋतुकाल में स्त्री की ऋताग्नि में रेत-सोम की आहुति होती है। अध्यात्म संस्था में दो प्रकार से चान्द्र सोम का भोग होता है। चन्द्रमा से अन्न द्वारा ‘रेत’ बनता है, हम उत्पन्न होते हैं। यह पहला भोग है। हमारे अन्न में तीनों लोकों का रस प्रतिष्ठित रहता है। अग्नि से दधि (घन) भाग, वायु से घृत (तरल), आदित्य से मधु (विरल), चन्द्रमा से अमृत आता है। विशुद्ध मधुमय सोमरस का नाम ही ‘मन’ है। एक ही अन्न शुक्र-ओज-मन इन तीन रूपों में परिणत हो जाता है। शुक्र वाक् है, ओज प्राण है तथा मन आदित्यमय चन्द्रमा है।

शुक्र भी चान्द्र है, मन भी चान्द्र है। शुक्र में और अन्न में चान्द्ररस आता है। दोनों के आने के अलग-अलग मार्ग हैं। जो चान्द्ररस सीधा शुक्र में आता है, उसे ‘सह’ कहते हैं। नक्षत्रों के सम्बन्ध से सह 28 भागों में विभक्त हो जाते हैं। ये ही आध्यात्मिक सन्तान पितर हैं। इनका मन के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। ये सह सजातीय आकर्षण से शुक्र में आते हैं। जो चान्द्ररस अन्न द्वारा आता है, वह सप्त धातुओं के माध्यम से मन बनता है। ‘अन्नमयं हि सौम्यं मन:’। चन्द्रमा षोडश (16) कलायुक्त है। एक-एक चान्द्र संवत्सर में एक-एक मन-कला का विकास होता है। इस प्रकार मन की सर्वात्मकता में 16 वर्ष लग जाते हैं। मनस्विता 16वें वर्ष में सम्पन्न होती है। हमारी प्राचीन विवाह संस्था का आधार यही षोडशी रूप रहा है, जो स्त्री के रजोदर्शन का काल था। आज तो यह काल घटकर 12-13 वर्ष रह गया है।

स्त्री इस काल में अपनी सौम्यता और मन के वातावरण का विकास करती है। प्रार्थना-उपासना-कामना ही उसकी चर्या में प्रधान होता है। उसका यह स्वप्नकाल भी होता है। उसकी सौम्यता के आधार पर ही उसके मन में कामना-स्नेह-श्रद्धा-वात्सल्य और प्रेम का विकास होता है। गृहस्थाश्रम में वही कामना बनकर जीवन में प्रवेश करती है। उसके प्राण जो अब तक पिता के प्राणों से संलग्न थे- अब ‘कन्यादान’ के प्रभाव से पति के प्राणों से संयुक्त हो जाते हैं। दोनों भीतर एक हो जाते हैं।

शक्ति का पूर्ण अवतार होती है स्त्री। पति के जीवन में जितने भी असुर हैं- उनका मर्दन शुरू कर देती है। उसका यह निर्माण 50 वर्ष की आयु तक चलता है। इसका आधार उसके भीतर का पुरुष भाव है, जो पूर्णत: पति के लिए संकल्पित रहता है। इसी की सहायता से वह पुरुष के स्त्रैण भाव का विकास करती है। गृहस्थाश्रम पूर्णत: अर्थप्रधान-कामनाप्रधान स्थूल सृष्टि का रूप है। वानप्रस्थ में स्त्री प्रजनन धर्म से भी मुक्त हो जाती है। दाम्पत्य जीवन मन के विकास (सेवाकर्म जैसे कार्यों) में जुड़ने लगता है। कार्य निवृत्ति भी अहंकार को कम करने में सहायक होती है।

पूरे समय शक्ति अपना कार्य करती रहती है। कभी स्नेह से, कभी श्रद्धा और वात्सल्य से। उसे जीवात्मा को ईश्वरात्मा से पुन: मिलाना है। इसी के लिए तो उसका अवतरण होता है। वही पति को सात्विक भाव तक लाती है, उसे भीतर से दृढ़ बनाती है। संकल्पित करने का प्रयास करती है। पुरुष को पाने के लिए मन को स्त्रैण बनाना पड़ता है। ऋत रूप होने से सत्य को आवरित करके रखती है। गृहस्थाश्रम में अर्थ और कामना सिद्धि, वानप्रस्थ में स्थूल (क्षर) शरीर गौण होकर क्रियाप्रधान सूक्ष्म शरीर (अक्षर) की भूमिका शुरू हो जाती है। पति के प्रति उसका वात्सल्य बढ़ने लगता है। शक्ति ही मां का रूप लेने लगती है।

जीवन (गृहस्थ) के आरंभ में वही शक्ति ‘क्षुधा’ रूप होकर प्रवेश करती है। अब वह ‘मातृरूपेण संस्थिता’ हो जाती है। पति को पुत्र भाव में लाकर ईश्वर को अर्पित कर देती है। स्वयं तो पति में ही लीन रहती है। चारों वर्णों में, चारों आश्रमों से गुजरते हुए दोनों हृदय की एकात्मता (अक्षर) के साथ अव्यय की ओर बढ़ जाते हैं। इसके बाहर स्त्री-पुरुष का पूरक स्वरूप समझा नहीं जा सकता।

शक्ति का पूर्ण अवतार होती है स्त्री। पति के जीवन में जितने भी असुर हैं- उनका मर्दन शुरू कर देती है। उसका यह निर्माण 50 वर्ष की आयु तक चलता है। इसका आधार उसके भीतर का पुरुष भाव है, जो पूर्णत: पति के लिए संकल्पित रहता है। इसी की सहायता से वह पुरुष के स्त्रैण भाव का विकास करती है। गृहस्थाश्रम पूर्णत: अर्थप्रधान-कामनाप्रधान स्थूल सृष्टि का रूप है।